Hindi Sex Stories मस्तानी हसीना 9

ठीक है दीदी. मैं तो लेट रहा हूँ.” विकी लेट गया. पीठ मेरी ओर थी. मैं

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Antarvasna काफ़ी देर तक बैठी रही और फिर विकी के पीछे सत के लेट गयी. पता नहीं कब

आँख लग गयी. जब आँख खुली तो सवेरा हो चुका था.इस घटना के बाद से हम दोनो में हँसी मज़ाक बहुत बढ़ गया था और विकी अपना

लंड मेरे जिस्म से रगड़ने का कोई मोका नहीं गँवाता था. लेकिन आज तक मुझे

विकी का खड़ा हुआ लॉडा देखने का मोका नहीं मिला था. कई बार कोशिश भी की.

कई बार सवेरे उसके कमरे में गयी , इस आशा से की उसके लॉड के दर्शन हो

जाएँ पर किस्मत ने साथ नहीं दिया. एक दिन मोका हाथ लग ही गया. विकी मेरा

टवल ले कर नहाने चला गया. उसे मालूम था कि मैं अपना टवल किसी को भी यूज़

नहीं करने देती थी. मैने उसे टवल ले जाते हुए देख लिया था लेकिन चुप रही.

जैसे ही वो नहा के टवल लपट कर बाहर निकला मैं उसकी ओर झपटी और चिल्लाई,

” तूने फिर मेरा टवल ले लिया. इसी वक़्त वापस कर. खबरदार जो आगे से

लिया.” इससे पहले की वो संभाले मैने टवल खीच लिया. विकी एकदम नंगा हो

गया.

” हाआआआअ……….. बेशरम ! तूने अंडरवेर भी नहीं पहना.” मेरी आँखों के सामने

विकी का मोटा किसी मंदिर के घंटे के माफिक झूलता हुआ लंड था. करीब करीब

उसके घुटनों तक पहुँच रहा था. विकी का मारे शरम के बुरा हाल था. अपने

हाथों से लंड को च्छुपाने की कोशिश करने लगा. लेकिन आदमी का लंड हो तो

च्छूपे, ये तो घोड़े के लंड से भी बड़ा लग रहा था. बेचारा आधे लंड को ही

च्छूपा पाया. मेरी चूत पे तो चीतियाँ रेंगने लगीं. हाई राम ! क्या लॉडा

है. मुझे भी पसीना आ गया था. अपनी घबराहट च्छूपाते हुए बोली,

” कम से कम अंडरवेर तो पहन लिया कर, नालयक!.” ओर मैने टवल दुबारा उसके

ऊपर फेंक दिया. विकी जल्दी से टवल लपट कर भागा. मैं अपने प्लान की

कामयाबी पे बहुत खुश थी, लेकिन जी भर के उसका लॉडा अब भी नहीं देख पाई.

ये तो तभी मुमकिन था जब विकी सो रहा हो. अब मेरी हिम्मत और बढ़ गयी. अगले

दिन मैं सवेरे चार बजे उठ कर विकी के कमरे में गयी. विकी गहरी नींद में

सो रहा था. उसकी लूँगी जांघों तक ऊपर चढ़ि हुई थी. विकी पीठ के बल लेटा

हुआ था और उसकी टाँगें फैली हुई थी. मैं दबे पावं विकी के बेड की ओर बढ़ी

और बहुत ही धीरे से लूँगी को उसकी कमर के ऊपर सरका दिया. सामने का नज़ारा

देख के मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी. पहली बार जब उसका लॉडा देखा था तो

इतनी घबराई हुई थी कि ठीक से देख भी नहीं पाई थी. दूसरी बार जब टवल खींचा

था तब भी बहुत थोरी देर ही देख पाई, लेकिन अब ना तो कोई जल्दी थी ओर ना

ही कोई डर. इतनी नज़दीक से देखने को मिल रहा था. सिकुड़ी हुई हालुत में

भी इतना लंबा था की पीठ पे लेटे होने के बावजूद भी लंड का सूपड़ा बिस्तेर

पर टीका हुआ था. दो बड़े बड़े बॉल्स भी बिस्तेर पर टीके हुए थे. इतना

मोटा था कि मेरे एक हाथ में तो नहीं आता. ऐसा लग रहा था जैसे कोई लंबा

मोटा, काला नाग आराम कर रहा हो. मन कर रहा था की सहला दूं और मुँह में

डाल के चूस लूँ, लेकिन क्या करती, मजबूर थी. चूत बुरी तरह से रस छ्चोड़

रही थी और पॅंटी पूरी गीली हो गयी थी. अब तो मेरा इरादा और भी पक्का हो

गया कि एक दिन इस खूबसूरत लॉड का स्वाद मेरी चूत ज़रूर लेगी. मैं काफ़ी

देर उसकी चारपाई के पास बैठी उस काले नाग को निहारती रही. फिर हिम्मत कर

के मैने उसके पूरे लॉड को हल्के से चूमा और मोटे सुपरे को जीभ से चाट

लिया. मुझे डर था की कहीं विकी की नींद ना खुल जाए. मन मार के मैं अपने

कमरे में चली गयी.